Note: These ten kurals are born of my own thought, not of any AI mind
Ethics of Forwarding
- Read what you forward, again and again;
and, having sent it, live by it then.
- Think for yourself and write in your own voice—
your mind will open, widen, rejoice.
- If all you share is what others send,
confusion will linger to no end.
- What, to whom, and when to share—
weigh it well, then forward with care.
- Writing your own is sowing in earth;
mere forwarding is reaping the wind’s worth.
- Though plain it appear, what is personally penned
is ever the nobler, right to the end.
- Think on your own—the voice you hear is yours;
forward alone—the echo, not the source.
- Think for yourself and write with your own hand;
your granary will fill till it overflows the land.
9 After others have harvested, if you go to glean,
Only the scattered grains will remain unseen.
- If still you over-forward, despite all you knew,
halve it—with love—let restraint guide you.
— Dhayanand Bharathi
Gurukulam, July 26, 2025
[அறிவிப்பு: இவை என் சொந்த எழுத்துக்கள். செயற்கை நுண்ணறிவு எழுதியது அல்ல]
பகிர்வின் நன்னெறி
[Ethics of Forwarding]
- பகிரும் முன் பகிர்வை பலமுறை படிக்க,
பகிர்ந்த பின் அதன்படி நடக்க.
- சுயமாய் சிந்தித்து, சொந்தமாய் எழுதினால்,
சிந்தை அதிகம் விரியும்.
- அடுத்தார் பகிர்ந்ததை மட்டுமே பகிர்ந்தால்,
அதிகம் குழப்பம் எஞ்சும்.
- யாருக்கு எதனை எப்போது பகிரணும்
என்பதை எண்ணிப் பகிர்க.
- சுயமாய் எழுதுதல் நிலத்தில் விதைப்பது;
பகிர்ந்து கொள்வது காற்றை அறுப்பது.
- சிறப்பற்றதாயினும் சொந்தமாய் எழுதுதல்
என்றும் சாலச் சிறந்து. - சொந்தமாய் சிந்தித்தால் உன் குரல் கேட்கும்;
பகிர்ந்து கொண்டால் எதிரொலி பிறக்கும்.
- சொந்தமாய் சிந்தித்து, சுயமாய் எழுதினால்
களஞ்சியம் நிரம்பி வழியும்.
- அடுத்தார் அறுத்த பின் சென்று தேடினால்,
சிந்திய தானியம் எஞ்சும்.
- இதனையும் மீறி அதிகம் பகிர்ந்தால்,
அன்புடன் அவரை நடத்து.
— தயானந்த பாரதி
குருகுலம், ஜூலை 26, 2025
नोट: ये दस कुरल मेरे स्वयं के विचारों की उपज हैं, किसी कृत्रिम बुद्धि (AI) की नहीं।
साझा करने की मर्यादा
1
भेजने से पहले कई–कई बार पढ़ ले तू;
भेजने के बाद उसी अनुसार जी ले तू।
2
खुद सोच, अपने शब्दों में जब तू लिखता है,
तेरे मन का आकाश और अधिक खुलता है।
3
बस दूसरों का लिखा ही आगे जो बढ़ाए,
अंत में उसके हिस्से भ्रम ही रह जाए।
4
किसे, कितना, कब बाँटना है—पहले विचार कर;
फिर ही विवेक से भेज, माप–तौल कर।
5
अपना लिखना धरती में बीज बोना है;
सिर्फ़ बाँटना तो जैसे हवा को काटना है।
6
चाहे न चमके, अपना लिखा ही उत्तम है;
सदा–सदा के लिये वही सच्चा सत्कर्म है।
7
स्वयं सोचोगे—तो अपनी ही आवाज़ सुनाई देगी;
सिर्फ़ आगे बढ़ाओगे—तो प्रतिध्वनि ही लौटेगी।
8
स्वयं सोच, स्वयं लिख—भंडार तेरा उमड़ कर भर जाएगा;
ज्ञान का कोष तेरे भीतर से छलक–छलक आएगा।
9
औरों की फसल कट जाने पर यदि तू ढूँढ़ने जाए,
तेरे ही सोचे हुए दानों की बचत हाथ आए।
10
फिर भी यदि तू बहुत अधिक ही बाँटता रहे,
प्रेम से उसे आधा कर, संयम को साथ करे।
१
प्रेष्टुं पूर्वं बहुशः पाठ्यं सम्यगवलोकयेत्;
प्रेष्य पश्चात् तदेवाचार्यं स्वजीवने स्थापयेत् ॥१॥
२
स्वयं चिन्त्य स्वयमेव लिखन् मनो विस्तारमाप्नुयात्;
एवं कृतः विचारोऽयम् बुद्धिं व्यापकतां नयेत् ॥२॥
३
परैरुपन्यासमेव यः केवलं प्रेषयत्यनु,
तस्य शेषे भ्रमोऽधिकः केवलमवशिष्यते ॥३॥
४
कस्मै कियत् कदा देयं इति पूर्वं विचिन्त्यताम्;
ततो विवेकपूर्वकं प्रेषणं क्रियताम् ॥४॥
५
स्वयं लिखनं भूमौ बीजस्य रोपणमेव हि;
मात्रं प्रेषणमुद्दीश्य वातच्छेदोपमा खलु ॥५॥
६
निरूपमं न भवेत् अपि स्वकृतं लेखनं श्रेयः;
सदा सदैव तत् श्रेयः, न तु परोपजीविका ॥६॥
७
स्वयं चिन्तयतः स्वस्य स्वरः श्राव्यः प्रजायते;
केवलं प्रेषयतः प्रतिध्वनिरुदेति केवलम् ॥७॥
८
स्वयं चिन्त्य स्वयमेव लिखतः कोषः पूर्णो भवेत्;
ततः समृद्धिधारा इव सञ्चरति निर्झरः ॥८॥
९
परैरलुनीते क्षेत्रे यः पश्चादन्ववेष्टति,
तस्यैव चिन्तितं बीजं धान्यमिवावशिष्यते ॥९॥
१०
एतेषामपि लङ्घित्वा यदि बहु प्रेषयसि,
स्नेहेन तदर्धं कुरु, संयमं धारय स्वयम् ॥१०॥
Dayanand Bharati
Ashram, July, 26, 2025
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